November 30, 2021

प्रदेश के कूनो पालपुर अभ्यारण्य में होगी चीतों की शिफ्टिंग

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भोपाल
कूनो पालपुर अभ्यारण्य में दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाने के पहले राज्य सरकार वहां की पारिस्थितिकी का फिर अध्ययन कराएगी। इस बार एमपी के आधा दर्जन अफसरों की टीम को दक्षिण अफ्रीका भेजकर कम से कम 15 दिन की टेÑनिंग दिलाई जाएगी और यह वॉच किया जाएगा कि वहां के जंगलों में चीतों को किस तरह का माहौल दिया जा रहा है। वन महकमे की कोशिश है कि कूनो अभ्यारण्य में लाए जाने के बाद ऐसी व्यवस्था हो कि चीते मनुष्यों को देख भी न सकें और जंगल में विचरण करते रहें। राज्य शासन ने प्रशिक्षण के लिए भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति मांगी है। इन हालातों में अब 12 से 14 चीतों की खेप जनवरी 2022 के बाद ही आ सकेगी।

वन अफसरों के मुताबिक इन चीतों को हवाई मार्ग से एमपी लाया जाएगा। इसके लिए चार्टर्ड प्लेन की व्यवस्था की जाएगी। यहां पहुंचने के बाद उनकी सभी तरह की जांच होंगी। प्लेन की यात्रा में उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं हो, इसके लिए चिकित्सकों का दल भी रहेगा। यहां उन्हें कुछ दिन एक निश्चित स्थान पर रखा जाएगा और उन पर कड़ी नजर रखी जाएगी। जब लगेगा कि सब कुछ ठीक-ठाक है तो फिर उन्हें कूनो पालपुर अभयारण्य में छोड़ा जाएगा। दक्षिण अफ्रीका से जो चीते लाए जाएंगे उनमें मादा और नर दोनों ही होंगे। अफसरों के मुताबिक इसके पहले भी वन अफसरों की टीम दक्षिण अफ्रीका जा चुकी है पर अब जबकि उन्हें वहां से शिफ्ट करने की तैयारी है तो एक बार फिर उनके बारे में स्टडी के लिए टीम भेजने की तैयारी की जा रही है।

कूनो को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किए जाने के बाद गुजरात के गिर से एशियाई शेरों यहां लाने की तैयारी थी लेकिन बाद में भारत सरकार ने इस पर सहमति नहीं दी। अब दक्षिण अफ्रीका के चीते इस अभ्यारण्य का आकर्षण बनेंगे। प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित यह अभ्यारण्य लगभग 900 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। 1981 में इस वन्यजीव अभ्यारण्य के लिए 344.68 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र निश्चित किया गया था। बाद में इसके क्षेत्र में वृद्धि की गयी। इस वन्यजीव अभ्यारण में भारतीय भेड़िया, बन्दर, भारतीय तेंदुआ तथा नीलगाय जैसे जानवर पाए जाते हैं। वर्ष 1994 में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया के वैज्ञानिकों ने यहां सर्वे किया था। इसके बाद वर्ष 1995 में तीन चरणों की सिंह परियोजना की शुरुआत का लक्ष्य निर्धारित किया गया। 24 गांवों को कूनो अभ्यारण्य के लिए विस्थापित किया गया जिसमें 1545 परिवारों का विस्थापन हुआ है और 20 करोड़ रुपए विस्थापन में खर्च हुए हैं।